Sandeep Chavan
क्या कृष्ण केवल आस्था और पूजा के विषय हैं, या वे उस जागरूक बुद्धि का प्रतीक भी हैं जो अनिश्चितता के बीच निर्णय लेती है?कृष्ण: बुद्धिमत्ता का एक प्रतीक भारतीय चिंतन का मौलिक दार्शनिक पुनर्पाठ है। संदीप चव्हाण कृष्ण को किसी अलौकिक सत्ता की पुष्टि या खंडन के बजाय मानवीय बुद्धिमत्ता की सक्रिय अवस्था के रूप में समझने का प्रयास करते हैं।पुस्तक पूछती है कि संघर्ष, भय, जिम्मेदारी और अनिश्चित परिणामों के बीच स्पष्टता कैसे बनी रहती है। यहाँ धर्म को केवल नियम, कर्म को केवल गतिविधि और अनासक्ति को पलायन मानने के बजाय उनके व्यावहारिक अर्थों की जाँच की जाती है।सात भागों और इक्कीस अध्यायों में प्रतीकों की आवश्यकता, मिथक की भूमिका, कृष्ण की प्रचलित व्याख्याएँ, जागरूकता, नैतिक निर्णय, अहंकार रहित नेतृत्व और कर्म के परिणामों का अध्ययन है। चव्हाणियन गतिशीलता के संदर्भ में पुस्तक यह भी पूछती है कि कृष्ण का प्रतीक आज क्यों प्रासंगिक है।यह न भक्ति का विरोध है, न किसी धार्मिक सिद्धांत का प्रचार। इसका उद्देश्य विरासत में मिले विचारों को अनुभव, विवेक और उत्तरदायित्व से जोड़ना है।भारतीय दर्शन, मनोविज्ञान, नेतृत्व और मानवीय व्यवहार में रुचि रखने वाले पाठकों के लिए एक गंभीर विचारयात्रा। 6