Sandeep Chavan
हम कृष्ण को जानते हैं-या शायद हम उस कृष्ण को जानते हैं जिसे धर्म, कथा, परंपरा और भक्ति ने हमारे सामने रखा है।लेकिन एक दूसरा प्रश्न शायद ही पूछा गया है:मानव बुद्धिमत्ता को कृष्ण की आवश्यकता क्यों पड़ी?कृष्ण: बुद्धिमत्ता का एक प्रतीक इसी प्रश्न से आरंभ होती है।यह पुस्तक कृष्ण को भगवान के रूप में सिद्ध करने का प्रयास नहीं करती। यह उन्हें मिथक कहकर खारिज भी नहीं करती। यह ऐतिहासिक कृष्ण की तिथि, जन्मस्थान या प्रमाण खोजने नहीं निकलती। इसके बजाय यह उस संरचना को समझने का प्रयास करती है जिसने कृष्ण जैसे प्रतीक को मानव कथा में आवश्यक बनाया।मनुष्य को बहुत पहले जागरूकता मिली, लेकिन पूर्ण ज्ञान कभी नहीं मिला। उसे निर्णय लेने पड़े जबकि जानकारी अधूरी थी। उसे संघर्षों में उतरना पड़ा जबकि परिणाम निश्चित नहीं थे। उसे कर्म करना पड़ा जबकि भविष्य उसके नियंत्रण में नहीं था।ऐसी स्थिति में बुद्धिमत्ता कैसे स्थिर रह सकती थी?यहीं से प्रतीकों, कथाओं और आदिरूपों की आवश्यकता जन्म लेती है।इस पुस्तक में कृष्ण उसी विकास का एक अत्यंत परिष्कृत रूप हैं-ऐसी बुद्धिमत्ता का प्रतीक जो दबाव में भी स्पष्ट रह सकती है; जो संघर्ष से भागे बिना उसमें कार्य कर सकती है; जो परिणामों पर नियंत्रण का भ्रम रखे बिना कर्म कर सकती है; और जो अपने कर्म की जिम्मेदारी किसी बाहरी शक्ति पर नहीं डालती।इस दृष्टि से कृष्ण किसी दूरस्थ दिव्य सत्ता की अपेक्षा एक संदर्भ-अवस्था बन जाते हैं-एक ऐसी अवस्था जिसे बुद्धिमत्ता तब पहचान सकती है जब जागरूकता, कर्म, परिणाम और उत्तरदायित्व एक ही क्षण में मिलते हैं।पुस्तक इसी आधार पर कई परिचित अवधारणाओं को फिर से खोलती है।धर्म केवल नैतिक आज्ञा नहीं रह जाता; वह परिस्थिति के साथ बुद्धिमत्ता क